
अदिति गुस्से में कमरे से बाहर निकल आती है। उसके कदम तेज़ थे और साँसें भी थोड़ी भारी। वह अपने चेहरे पर आए बालों को झटकते हुए हटाने लगती है। फिर अचानक उसकी नज़र अपने हाथों पर पड़ती है। वह एक पल के लिए रुक जाती है। उसे समझ ही नहीं आ रहा था कि उसे कौन-सा इंजेक्शन दिया गया था कि वह इतनी गहरी बेहोशी में चली गई थी। उसका सिर अभी भी थोड़ा भारी लग रहा था। वह इधर-उधर देखने लगती है। आख़िर वह कहाँ आ गई है? अभी-अभी उसने उस आदमी के मुँह से सुना था कि वह इंडिया में है। उसकी आँखें फैल जाती हैं। “ओह माय गॉड… ऐसा कैसे हो सकता है…? क्या मैं सच में इंडिया आ गई हूँ…?”
उसका पूरा दिमाग फ्रस्ट्रेशन से भर गया था। वह तेज़ी से आगे बढ़ने लगती है। रास्ते में आते-जाते सभी लोग बस उसे ही देख रहे थे। हवेली में बहुत सारे वर्कर्स लगे हुए थे। पूरा घर सजाया जा रहा था… शायद कोई फंक्शन होने वाला था। यह सब देखकर अदिति की आँखें हल्की-सी सिकुड़ जाती हैं। लेकिन वह इन सबको इग्नोर करते हुए बस बाहर निकलने का रास्ता ढूँढने लगती है।







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